Buffalopedia प्रसव अवस्था प्रसूतिकाल के रोग
Print E-mail

प्रसूतिकाल के रोग

प्रसूतिकाल प्रसव के बाद का वह समय है जिसमें मादा जननांग विशेष रूप से बच्चेदानी, शारीरिक व क्रियात्मक रूप से अपनी अगर्भित अवस्था में वापस आ जाती है। इसमें लगभग 45 दिन का समय लगता है। प्रसूतिकाल में होने वाले रोग इस प्रकार है।

जनननलिका, योनि अथवा भगोष्ठों की चोट 

यदि भैंस का बच्चा फंस गया है अथवा बच्चे का आकार बड़ा है तो बच्चे को बाहर खींचने के दौरान जनननलिका क्षतिग्रस्त हो सकती है। इसकी संभावना उस समय और भी बढ़ जाती है जब किसी नीम-हकीम से बच्चा खिंचवाया गया हो। यदि चोट अधिक है तो वहां पर टांके लगाने की जरूरत पड़ती है। किसी पशु चिकित्सक से सम्पर्क करें। यदि खरोंच हल्की है तो उसे नीम या फिटकरी के पानी से साफ करके, उस पर तेल-हल्दी मिलाकर रोजाना दो-तीन बार लगायें। इसके अतिरिक्त उस पर कोर्इ भी एण्टीसेप्टिक क्रीम लगार्इ जा सकती है। सफार्इ का विशेष ध्यान रखें ताकि उस पर मक्खियां न बैंठे।

                                                                                              

जेर रूकना / फंसना 

गर्भाशय में बच्चा पानी की थैली के अंदर सुरक्षित रहकर बढ़ता है। ब्याने के समय ये थैली फट जाती है तथा बच्चा बाहर आ जाता है। ब्याने के लगभग 2-8 घंटे बाद खाली हुर्इ ये थैली (जेर) भी बाहर आ जाती हैं। इससे गर्भाशय पूरी तरह खाली हो जाता है। परन्तु कभी-कभी ये जेर ब्याने के बारह घंटे बाद तक नहीं निकलती। तब इसे जेर रूकना या फंसना कहते हैं। जेर रूकने के मुख्य कारण इस प्रकार हैं:

Ø  भैंस का समय से पहले बच्चा देना,

Ø  गर्भपात होना,

Ø  भैंस में कैल्शियम की कमी,

Ø  भैंस को संतुलित पोषण न मिलने के कारण कमजोर होना अथवा बच्चे का आकार काफी बड़ा होना।

जेर रूकने पर निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए:

Ø  जेर रूकने पर भैंस को साफ जगह पर बांधना चाहिए।

Ø    भैंस के बैठने पर जेर का कुछ हिस्सा बाहर आ जाता है, जिस पर भूसा, कचरा, मिट्टी व अन्य गंदगी चिपक जाती है। भैंस के खड़ी होने पर जेर से चिपकी गंदगी जेर के साथ खिंच कर अन्दर चली जाती है, जिससे गर्भाशय में संक्रमण की संभावना बढ़ जाती है।

Ø    जेर रूकने पर पशु चिकित्सक की सलाह आवश्यक हो जाती है।

Ø    जेर हमेशा ब्याने के 24 घंटे बाद ही डाक्टर द्वारा निकलवानी चाहिए। ऐसा इसलिए है, कि गर्भाशय द्वारा जेर की पकड़ ढीली पड़ जाती है और जेर निकालते समय गर्भाशय को कोर्इ हानि नहीं पहुंचती।

Ø    जेर निकालने से पहले, भैंस का पिछला हिस्सा व जेर का लटकता हुआ हिस्सा साबुन व साफ पानी से अच्छी तरह धो लें।

Ø    जेर निकलवाने में आधा घंटे से अधिक का समय नहीं लगना चाहिए।

Ø  जेर निकालते समय हाथ साफ होने चाहिए तथा नाखून कटे होने चाहिए।

Ø    कभी-कभी डाक्टर पूरी तरह से जेर को नहीं निकाल पाते हैं क्योंकि जेर अन्दर से काफी चिपकी रहती है। इस बारे में भैंस पालक डाक्टर पर अधिक जोर न डालें। ऐसी स्थिति में जेर अपने आप थोड़ी-थोड़ी  कटकर बाहर आती रहती है।

Ø    जेर निकालने के बाद डाक्टर से बच्चेदानी में उचित गोलियां रखवा लें। ये गोलियां तथा अन्य इंजेक्शन कम से कम 3-5दिन तक अवश्य लगवाने चाहिए। ऐसा न करने  पर बच्चेदानी में अक्सर मवाद पड़ जाती है, दूध उत्पादन घट जाता है और फिर से इलाज की जरूरत पड़ती है।

Ø    जेर रूकने पर उस पर इर्ट-पत्थर आदि नहीं बांधना चाहिए। इससे बच्चेदानी के पलटने का खतरा रहता है।

                                                                                                                                                                                          

गर्भाशय में मवाद पड़ना (गर्भाशय शोथ/मेट्राइटिस) 

ब्याने के बाद कुछ भैसों के गर्भाशय में मवाद पड़ जाती है। इसकी संभावना ब्याने से लेकर लगभग दो महीने तक अधिक होती है। मवाद की मात्रा कुछ मि0ली0 से लेकर कर्इ लीटर तक हो सकती है।

Ø  मवाद पड़ने पर भैंस की पूँछ के आसपास चिपचिपा मवाद दिखार्इ देता है तथा मक्खियां भिनकती रहती हैं।

Ø  भैंस के बैठने पर मवाद अक्सर बाहर निकलता रहता है, जो फटे हुए दूध की तरह या लालिमा लिए हुए गाढे़ सफेद  रंग का होता है।

Ø  कुछ पशु जलन होने के कारण पीछे की ओर जोर लगा़ते रहते हैं। रोग की तीव्र अवस्था में पशु को बुखार हो सकता है, भूख कम हो जाती है तथा दूध सूख जाता है।

Ø  इस रोग के उपचार के लिए डाक्टर से सम्पर्क कर बच्चेदानी में दवार्इ रखवाकर इंजैक्शन लगवाने चाहिए तथा र्इलाज कम से कम 3-5 दिन अवश्य करवाना चाहिए। इलाज न करवाने पर पशु बांझ हो सकता है।

Ø  गर्मी में आने पर ऐसी भैंस की पहले डाक्टरी जांच करानी चाहिये। उसके बाद ही उसका गर्भाधान प्राकृतिक अथवा कृत्रिम विधि द्वारा कराना चाहिये। हो सकता है 1-2 गर्मी के अवसर छोड़ने पड़ें।    

                                                                                                                                                                                            

दुग्ध ज्वर (मिल्क फीवर) 

यह मुख्य रूप से उन भैसों का रोग है, जो ज्यादा दूध देती हैं तथा जिन भैंसो को कैल्शियम की पूरी मात्रा नहीं मिल पाती है। यह रोग मुख्य रूप से ब्याने के लगभग 72 घंटे के अंदर होता है।

Ø  भैंस का शरीर ठंडा पड़ जाता है, तथा कमजोरी महसूस करने के कारण वह खड़ी नहीं रह पाती और बैठ जाती है।

Ø  वह अपनी गर्दन को कोख के उपर रख लेती है।

Ø  भैंस जुगाली करना बंद कर देती है तथा गोबर अक्सर सूखा करती है।

Ø  भैंस को कंपकपी महसूस होती है तथा बेहोशी छायी रहती है।

Ø  इसके उपचार के लिए डाक्टर को बुलाकर कैल्शियम की बोतल खून में लगवानी चाहिए।

Ø  डाक्टर कैल्शियम की कुल मात्रा का आधा भाग खून में तथा आधा भाग चमड़ी के नीचे लगाते हैं।

Ø  कैल्शियम की दवा रामबाण औषधि की तरह काम करती है तथा भैंस तुंरत खड़ी होकर जुगाली करने लगती है।

Ø  किसान भार्इयों को चाहिए कि चमड़ी के नीचे लगे इंजैक्शन के स्थान की सिकार्इ करें।

Ø  रोग की रोकथाम के लिए भैंस को खनिज लवण मिश्रण खिलाएं।

Ø  ब्याने के 2-3 दिन बाद तक सारा दूध एक साथ न निकालें तथा थोड़ा दूध थनों में भी छोड़ते रहें।

                                                        दुग्ध ज्वर में बैठने की मुद्रा

                                                                                                                                                                                            

 
 
कॉपीराइट ©: Buffalopedia,केंद्रीय भैंस अनुसंधान संस्थान ,भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, एक स्वायत्त संगठन, कृषि अनुसंधान और शिक्षा विभाग के तहत, कृषि मंत्रालय, भारत सरकार के अंतर्गत आता है| सूचना का अधिकार | अस्वीकृत करना | गोपनीयता कथन
भा.कृ.अ.प.- केंद्रीय भैंस अनुसंधान संस्थान द्वारा डिजाइन और विकसित किया गया है|